गुरुवार, 29 जनवरी 2015

हिंदी क्या कभी न्याय की भाषा बन पाएगी !!

कुछ दिन पहले भारत सरकार नें सर्वोच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालयों में हिंदी लागू करने के प्रश्न को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में जो हलफनामा दायर किया था ! जिसका जिक्र अखबारों के पन्नों पर तो हुआ लेकिन उन इलेक्ट्रोनिक मीडिया चेन्न्लों की सुर्खियाँ नहीं बन सका जो अपनें को सबसे बड़े हिंदी समाचार चेन्नल होने का दावा जताते रहते हैं ! सरकारी हलफनामे में वही बातें थी जो आज तक अंग्रेजी को लागू रखने के समर्थक कहते रहे हैं ! 

सरकार उसी हलफनामे में यह कहती है कि हर एक न्यायालय और जनता को उच्च न्यायालय के फैसलों और आदेशों को जानने का अधिकार है और अभी अंग्रेजी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जिसमें यह काम हो सकता है ! सरकार का यह भी कहना है कि अभी तक कानून की किताबें ,वाद विवाद और केस स्टडी सब अंग्रेजी में होतें हैं इसलिए अगर अभी हिंदी को जबरन लागू किया गया तो न्यायिक प्रक्रिया की गुणवता फार असर पड़ सकता है ! 

जहां तक इस हलफनामे में सरकार सर्वोच्च न्यायालयों के फैसलों को जानने के अधिकार की बात कह रही है वो अपनें आपमें हास्यास्पद ही है ! सरकार नें अदालतों और जनता को एक ही नजर से देखने का कार्य किया है जो सही नहीं है ! क्योंकि अदालतें तो अंग्रेजी में सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को जान सकती है और समझ सकती है लेकिन जनता का एक बड़ा वर्ग इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता है ! उसकी मूल भाषा अंग्रेजी नहीं है और ना ही वो अंग्रेजी पढ़ सकता है और ना ही समझ सकता है ! ऐसे में उस बहुसंख्यक जनता के अधिकार को क्यों नकारा जा रहा है !

कानून की किताबें,वाद विवाद और केस स्टडी इत्यादि जो आज अंग्रेजी में हैं वो तो तब तक अंग्रेजी में ही रहनें वाले हैं जब तक सरकार हिंदी को लागू नहीं करती है और पहले की न्याय सामग्री का भाषांतरण नहीं करवाती है ! हिंदी को जब तक लागू नहीं किया जाएगा तब तक सरकार की यह दलील तो यथावत ही रहने वाली है ! तो क्या सरकार यह मान रही है कि हिंदी को कभी न्याय की भाषा बनाई ही नहीं जा सकती है ! सवाल दलीलों का नहीं बल्कि सवाल इच्छाशक्ति का है क्योंकि आजादी से पहले कुछ लोग ऐसे भी थे जो अंग्रेजों के भारत में रहने के पक्ष में भी दलीलें देते थे ! सरकार को हिंदी को न्याय की भाषा बनाने के लिए कभी ना कभी तो मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय देना ही होगा !